Kyon Hawa Aaj Yoon Ga Rahi Hai (Veer Zaara)
एक दिन जब सवेरे सवेरे सुर्वयीं से अंधेर की चादर हठाके
एक पर्वत के तकिये से सूरज ने सर जो उठाया तो देखा
दिल कि वादी में चाहत का मौसम है और यादों की डालियों पर
अन्गिनत बीते लम्हों की कलियाँ मेहेकने लगी हैं
अन्कही अन्सुनी आरज़ू आधी सोयी हुई आधी जागी हुई
आँखें मलते हुई देखती है
लहर दर लहर मौज दर मौज बहती हुई ज़िंदगी फिर से हर पल नयी
और फिर भी वही हाँ वही ज़िंदगी
जिस्के दामन में एक मुहौब्बत भी है कोई हसरत भी है
पास आना भी है दूर जाना भी है और यह एहसास है
वक़्त झरने सा बहता हुआ जा रहा है यह कहता हुआ
दिल की वादी में चाहत का मौसम है और यादों की डालियों पर
अन्गिनत बीते लम्हों की कलियाँ मेहेकने लगीं हैं
क्यों हवा आज यूँ गा रही है...
क्यों हवा आज यूँ गा रही है
क्यों फिज़ा रंग छलका रही है
मेरे दिल बता आज होना है क्या
चांदनी दिन में क्यों छा रही है
ज़िंदगी किस तरफ जा रही है
मेरे दिल बता क्या है यह सिलसिला
क्यों हवा आज यूँ गा रही है
आ...
जहाँ तक भी जाएँ निगाहें
बरसते है जैसे उजाले
जहाँ तक भी जाएँ निगाहें
बरसते है जैसे उजाले
सजी आज क्यों है यह राहें
खिले फूल क्यों है निराले
खुशबुयें कैसी यह बह रहीं हैं
धड़कने जाने क्या कह रहीं हैं
मेरे दिल बता यह कहानी है क्या
क्यों हवा आज यूँ गा रही है... गा रही है... गा रही है...
आ...
यह किसका है चेहरा जिसे मैं
हर एक फूल में देखता हूँ
यह किसका है चेहरा जिसे मैं
हर एक फूल में देखता हूँ
यह किसकी है आवाज़ जिसको
ना सुनके भी मैं सुन रह हूँ
कैसी यह आहटेँ आ रही हैं
कैसे यह ख्वाब दिखला रही है
मेरे दिल बता कौन है आ रहा
क्यों हवा आज यूँ गा रही है... गा रही है... गा रही है... आ...
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